छोटी फिल्में, बड़ी कामयाबी

भारत में बड़े परदे की फिल्मों का कारोबार तो फल-फूल रहा ही है, उसके समांतर छोटी फिल्मों यानी शॉर्ट फिल्मों ने भी कला और कामयाबी का एक अलग संसार रचना शुरू कर दिया है। पहले नौसिखिया कलाकार छोटी फिल्में बना कर फिल्म निर्माण का अभ्यास किया करते थे, पर अब ये फिल्में बड़े निर्माता-निर्देशकों-सिने कालाकारों को भी आकर्षित कर रही हैं। यू-ट्यूब से लेकर कई ऑनलाइन अड्डों पर ऐसी फिल्में खूब देखी और सराही जा रही हैं। कम लागत में बन कर अच्छी कमाई कर रही हैं। छोटी फिल्मों की दुनिया का जायजा ले रही हैं नाज़ ख़ान।
हाल में अभिनेता जैकी श्रॉफ की बाईस मिनट की छोटी यानी शॉर्ट फिल्म ‘शून्यता’ ने खूब सराहना बटोरी। अमेरिका के लॉस एंजेलिस के बेस्ट ऑफ इंडिया शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में इसे पुरस्कृत किया गया। देखा जाए तो यह अपने आप में एक उपलब्धि कही जा सकती है, उन कम अवधि और मुनासिब बजट में बनने वाली शॉर्ट फिल्मों के लिए, जिन्हें कभी मीडिया और सिनेमा के छात्र महज प्रयोग के तौर पर बनाया करते थे, जो कुछ खास मौकों पर दिखाई जाती थीं और फिल्म फेस्टिवल तक सीमित रहा करती थीं। मगर आज इन फिल्मों का अपना एक बड़ा दर्शक वर्ग है। मनोरंजन और गंभीर समस्याओं पर बनने वाली शॉर्ट फिल्में अगर आज युवाओं में लोकप्रिय हो रही हैं, तो इसकी अहम वजह है कि इनमें आम जिंदगी के असल मुद्दों को कलात्मकता के गठजोड़ के साथ इस तरह दिखाया जाता है कि यह दर्शकों के दिल को छूती हैं। साथ ही चंद मिनट की इन फिल्मों में कसा हुआ निर्देशन दर्शकों को बांधे रखता है।
बड़ी और फीचर फिल्मों के साथ बीते कुछ समय में शॉर्ट फिल्मों की तरफ लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। डिजिटलीकरण के इस युग में ये आज युवाओं की पसंद बन कर उभर रही हैं। इनको पसंद करने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग है, जो इनके उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा कर रहा है। यही वजह है कि कभी नए कलाकारों, निर्देशकों तक सीमित रहने वाली इन फिल्मों में अब स्थापित निर्देशक और कलाकार भी रुचि दिखा रहे हैं। इसकी खास वजह यही है कि जहां कम समय और कम बजट में इन फिल्मों को बनाना आसान है, वहीं इनको बनाने के लिए बहुत ज्यादा ताम-झाम की जरूरत नहीं पड़ती और कम संसाधनों में ही फिल्म बन कर दर्शकों की कसौटी पर आ जाती है, जहां उनके लाइक इनको सफल फिल्मों की सूची में शामिल करते हैं।
हालांकि भारत में व्यवस्थित रूप में इन फिल्मों का बाजार उपलब्ध नहीं है। मगर हालात बदल रहे हैं और सोशल मीडिया के जरिए शॉर्ट फिल्मों का भविष्य उज्ज्वल नजर आ रहा है। अगर फिल्म अच्छी बनी है और दर्शकों के लाइक पाने में कामयाब हो गई है, तो आई ट्यून्स, वीडियो ऑन डिमांड, शॉर्ट फिल्म्स क्लब, क्राउड फंडिंग, शॉर्ट फिल्म मार्केट जैसे माध्यमों के जरिए ये फिल्में अच्छी कमाई करती हैं। इसमें यूट्यूब शॉर्ट फिल्मों को दिखाने का एक ऐसा सशक्त माध्यम है, जिस पर फिल्म अपलोड होते ही विज्ञापन आने शुरू हो जाते हैं।यूट्यूब पर आज फिल्म देखने वाले युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है ही, इसे देखते हुए फिल्म निर्माण करने वाले बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस भी अब इस ओर ध्यान दे रहे हैं। यशराज फिल्म्स ने तो शॉर्ट फिल्मों के लिए अलग से एक फिल्म प्रोडक्शन ‘वाई फिल्मस’ के नाम से ही खोल दिया है।
कला और कामयाबी के मुकाम
इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ समय में शॉर्ट फिल्मों ने अपनी अलग पहचान बना ली है। इनकी सफलता इसलिए भी मायने रखती है कि इनको देखने को उकसाने के लिए किसी तरह का प्रचार नहीं किया जाता, वहीं इनकी सफलता बेहतर कहानी और सफल निर्देशन पर निर्भर होती है। निर्देशकों को भी इन फिल्मों के जरिए अपनी कल्पना को साकार करने का पूरा मौका मिलता है, उन्हें सेंसरशिप के झमेलों से भी गुजरना नहीं पड़ता। यही वजह है कि साल दर साल इन फिल्मों की संख्या बढ़ती जा रही है और पिछले साल तो अब तक की सबसे ज्यादा शॉर्ट फिल्में रिलीज हुर्इं। जहां सोशल मीडिया ने मनोरंजन के भरपूर साधन दिए, वहीं डिजिटल मीडिया ने हर किसी को अपनी प्रतिभा दिखाने का प्लेटफार्म भी दिया है और शॉर्ट फिल्में इसका सबसे बेहतर उदाहरण कही जा सकती हैं। कभी संघर्षरत कलाकारों के लिए शॉर्ट फिल्में एक अहम प्लेटफार्म हुआ करती थीं। मगर आज इन फिल्मों की सफलता को देखते हुए अब न सिर्फ बड़े कलाकार ही इन फिल्मों का रुख कर रहे हैं, बल्कि कई नामी निर्देशकों को भी शॉर्ट फिल्मों का प्लेटफॉर्म भा रहा है। ऐसे में निर्देशक इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, मधुर भंडारकर, सुजॉय घोष जैसे बड़े निर्देशकों का ध्यान भी इस ओर गया है। इसकी खास वजह है कि कम लागत और कम समय में तैयार होती इन फिल्मों के जरिए मनोरंजन के साथ-साथ एक बेहतर संदेश भी समाज तक पहुंच रहा है। निर्देशक इम्तियाज अली की ‘इंडिया टुमारो’ ने खूब चर्चा में रही। इम्तियाज अली कहते हैं कि यहां फिल्म निर्माताओं को आजादी है। इन फिल्मों को सेंसर की कैंची का डर नहीं रहता। एक यह वजह भी है कि शॉर्ट फिल्में फीचर फिल्मों से कहीं प्रभावी साबित हो रही हैं।
हालांकि इनसे उतनी आमदनी तो नहीं होती, ऐसे में कुछ लोग जहां इन फिल्मों को मुनाफे के सौदे से जोड़ कर देखते हैं, वहीं कुछ के लिए बिकाऊ होने से ज्यादा इनका कलात्मक होना अहमियत रखता है। शॉर्ट फिल्मों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर अब छोटे और बड़े पर्दे की कई अभिनेत्रियों ने भी शॉर्ट फिल्मों के निर्देशन की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। अभिनेत्री रिचा चड्ढा जहां व्यंग्य पर आधारित एक शॉर्ट फिल्म 2025 का निर्माण कर रही हैं, वहीं आरती नागपाल ने ‘एब्यूज’ नाम की बारह मिनट की एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। इसके अलावा मानसी जैन फिल्म ‘चटनी’ और ‘छुरी’ का सफल निर्देशन कर शॉर्ट फिल्मों के क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी हैं।
भारत में शॉर्ट फिल्मों के इतिहास में ‘लिटिल टेररिस्ट’ ने इन फिल्मों के चलन को आगे बढ़ाया। ऐसी कितनी ही फिल्में हैं, जो लोकप्रिय होने के साथ ही ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित भी हुई। इससे उत्साहित इन फिल्मों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष पहले से कहीं ज्यादा यानी अब तक की सबसे ज्यादा बीस शॉर्ट फिल्में रिलीज हुर्इं। जहां इन फिल्मों में गंभीर मुद्दे उठाए गए, वहीं मनोरंजन की कसौटी पर भी ये फिल्में दर्शकों को गुदगुदाती नजर आर्इं। जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘खुजली’ ऐसे ही एक खुजली से परेशान पति की कहानी है। वहीं सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फिल्मों में रही बाईस मिनट की ‘द मैनलिएस्ट मैन’ भेदभाव और बच्चियों से जुड़े मुद्दे पर आधारित फिल्म है।
इसके अलावा ‘आमद’ फिल्म ने बाप-बेटे के बीच के रिश्ते को मार्मिकता से दर्शाया गया है। वहीं ‘जय माता दी’ सबसे मनोरंजक फिल्मों में शुमार रही। सुजॉय घोष की ‘अनुकूल’ भविष्य की वह भयावह तस्वीर पेश करती नजर आई जिसमें बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या पर सवाल उठाया है। साथ ही इंसान और रोबोट को इंसानियत के खिलाफ खड़ा दिखाया गया है। वहीं बुढ़ापे में हुए पे्रम पर आधारित फिल्म ‘खीर’ मनोरंजन का अलग ही तड़का लगाती है। इसके अलावा ‘स्याही’ बचपन की सैर कराने वाली फिल्म कही जा सकती है। यह एक बच्चे और उसके पिता के बीच बुनी गई मासूम-सी कहानी है। ‘जूस’, पंद्रह मिनट से भी कम अवधि की इस फिल्म में महिलाओं और रसोई के बीच जो ताना-बाना बुना दिखाया गया है, वह काबिले-तारीफ है। बचपन में बात-बात पर कसम खाने की आदत पर बनी फिल्म है ‘शपथ’। मराठी भाषा की यह फिल्म अपने विषय के साथ सबको लुभाती है।
‘इंटीरियर कैफे नाइट’ चार लोगों की जिंदगी पर आधारित यह एक मार्मिक फिल्म है। इसमें नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज कलाकार ने अभिनय किया है। शॉर्ट फिल्मों के बारे में नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि शॉर्ट फिल्मों के जरिए नए प्रतिभाशाली निर्देशक और अभिनेताओं को काम करने का मौका मिल रहा है। भारत में ऐसी कई फिल्में हैं, जो अपने विषय और कलात्मकता के आधार पर देश-विदेश में न सिर्फ सुर्खियां बटोर रही हैं, बल्कि कई फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार भी जीत चुकी हैं। ‘ऑल आई वांट’ सात-आठ साल के एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जो इसमें आम खरीदने की अपनी छोटी-सी ख्वाहिश को साकार करता नजर आता है। अपने साधारण विषय के साथ दिल को छू लेने वाली इस फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार से नवाजा गया।
तीस मार खां, जोकर जैसी विफल फिल्मों के बाद फिल्म निर्माता शिरीष कुंदर ने शॉर्ट फिल्मों का रुख किया और इसी क्रम में ‘कृति’ बनाई, जो जिसे काफी पसंद किया गया। वहीं कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित अपनी शॉर्ट फिल्म ‘मुरब्बा’ से सराहना बटोर रहे निर्माता अनुराग कश्यप भी छोटी अवधि की इन फिल्मों में रुचि लेते आ रहे हैं। कई में तो उन्होंने अभिनय भी किया है। उनका कहना है कि ‘शॉर्ट फिल्में भारतीय सिनेमा का भविष्य निर्धारित करेंगी।’ ‘इंडिया टुमारो’ निर्देशक इम्तियाज अली और एआर रहमान के संगीत से सजी फिल्म है, जो कल के भारत की छवि एक लड़की के माध्यम से दिखाने की कहानी है। ‘नो स्मोकिंग’ धूम्रपान से जुड़े मसले पर बनी यह फिल्म एक बेहतर संदेश के साथ अपना असर छोड़ती है। मध्यवर्ग की महिला पर आधारित शॉर्ट फिल्म ‘चटनी’ को अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा ने प्रोड्यूस किया है। ‘मामाज ब्वॉय’ एक महिला के मन की बात को रखती एक मार्मिक फिल्म है।

बड़े कलाकारों की भी पसंद
जहां नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और शबाना आजमी जैसे दिग्गज कलाकारों शॉर्ट फिल्मों में अपनी अदाकारी के रंग काफी पहले से भरते आ रहे हैं, वहीं रुपहले पर्दे के कई अन्य कलाकार भी अब इन फिल्मों में अभिनय करना पसंद कर रहे हैं। ‘कृति’ मनोज वाजपेयी और राधिका आप्टे के अभिनय से सजी ऐसी ही एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है, जिसे काफी पसंद किया गया। इसके अलावा मनोज वाजपेयी की ‘तांडव’ को भी सराहना मिली। लंबे समय से सिल्वर स्क्रीन से नदारद रहीं अभिनेत्री ईशा देओल ने एक बार फिर फिल्मों की ओर रुख किया है। हालांकि इस बार वह बड़े पर्दे पर नहीं, बल्कि शॉर्ट फिल्म ‘केकवॉक’ में दिखाई देंगी।
फरहान अख्तर अपनी शॉर्ट फिल्म ‘पॉजिटिव’ को अपनी जिंदगी की सबसे बेहतर फिल्मों में से मानते हैं। जाने-माने शिक्षाविद् मितुल दीक्षित द्वारा निर्मित शॉर्ट फिल्म ‘आबा’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। वहीं इनकी सफलता से उत्साहित होकर कई राज्यों में अब शॉर्ट फिल्में बनाने का चलन बढ़ रहा है और इन फिल्मों के निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। हिमाचल प्रदेश में इसके लिए फिल्म मेकिंग योजना शुरू की गई है, जिसमें शॉर्ट फिल्मों के निर्माण के लिए राज्य सरकार की ओर से आवेदन मांगे जाते हैं और सहायता प्रदान की जाती है। कुल्लू के कुछ युवा कलाकारों ने करीब बारह मिनट की एक फिल्म बनाई थी ‘चिट्टा’, जिसे खूब सराहना मिली। यह फिल्म कुल्लू के आसपास के इलाकों में युवाओं में बढ़ रही नशाखोरी की लत को ध्यान में रख कर बनाई गई है। इसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं में छोटी फिल्में बहुतायत में बन रही हैं।
कलात्मकता के साथ गंभीर विषय
आज शायद ही ऐसा कोई विषय हो, जिस पर शॉर्ट फिल्म न बनी हो या न बन रही हो। गंभीर समस्याओं को कलात्मकता के साथ दर्शाती इन फिल्मों के जरिए बेहतर संदेश भी दिए जाते रहे हैं। इसी कड़ी में फिल्म निर्देशक सैयद इम्तियाज अली की शॉर्ट फिल्म ‘पानी पंचायत’ पानी की समस्या पर एक अलग नजरिया पेश करती नजर आती है। इसमें पानी के संरक्षण और संवर्द्धन के तकनीकी व व्यावहारिक पहलुओं को उजागर किया गया है। जहां कुछ समय पहले शबाना आजमी अभिनीत ‘आउटसाइड’ में घरेलू हिंसा जैसे मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था, वहीं ‘मेरी बेटी सनी लियोनी बनना चाहती है’ महिला सशक्तीकरण पर आधारित ग्यारह मिनट की इस शॉर्ट फिल्म में महिलाओं की यौन उन्मुक्तता पर एक बच्ची के माध्यम से और बड़ी बेबाकी के साथ सवाल उठाया गया है। फिलहाल अंडरवर्ल्ड और हॉरर फिल्में बनाने के लिए मशहूर रहे रामगोपाल वर्मा की यह फिल्म यूट्यूब पर काफी लाइक बटोर रही है। साथ ही इसे काफी सराहा जा रहा है।
बच्चों के साथ बढ़ते यौन शोषण को एक गंभीर समस्या के तौर पर लेते हुए नेशनल काउंसिल ऑफ एजुके शन रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने ‘कोमल’ नाम की एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। इस शॉर्ट एनिमेटेड फिल्म को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की चाइल्ड लाइन संस्था ने तैयार किया है। इसमें बच्चों को गुड टच और बैड टच के बारे में बता कर उन्हें यौन शोषण जैसी समस्या से आगाह रहने की ओर प्रेरित किया जा रहा है। एक अलग ही, लेकिन जरूरी विषय को छूती अभिनेता टॉम आल्टर की फिल्म ‘किताब’ पब्लिक लाइब्रेरियों में छाई खामोशी, लोगों की किताबें पढ़ने की तरफ घटती रुचि और उन्हें लाइब्रेरियों की ओर आने को पे्ररित करती शॉर्ट फिल्म है। इसके अलावा मुस्लिम समाज में व्याप्त हलाला जैसी कुप्रथा पर तंज करती फिल्म ‘मियां कल आना’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया। ‘द स्कूल बैग’ एक बच्चे और उसके स्कूल बैग की मांग करने जैसे भावुक विषय को पेश करती नजर आती है। राधिका आप्टे अभिनीत ‘अहल्या’ में पौराणिक कथा को नए तरीके से पेश करते हुए सवाल उठाया गया कि गलतियों के लिए हर बार अहल्या ही पत्थर क्यों बनती रहे। इस तरह अपनी छोटी-सी अवधि के साथ गंभीर सवाल पैदा करती यह फिल्में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो रही हैं।

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